साठ दिन की सज़ा और है ,
फिर अंत , मोक्ष का भ्रम |
इस सीलन भरे कमरे के भाग्य का
क्षणिक सुख है ,
सांस का , हलचल का , जीवन और अंत का |
दूर कहीं हँसी है ,
सन्नाटे की संगिनी |
नमकीन हवा बहाकर ले आती है ,
भोर के साथ |
दो लहरों के खिलवाड़ की हँसी ,
सफ़ेद झाग और रेत के क्षणिक मिलन की हँसी |
स्थायी होना ही संपूर्ण होना नहीं होता |
ज्वार की चहलकदमी पर चट्टानों की रोक है |
वह एक प्रहार है ,
पानी की चमक पर , ठोस शिला का ,
पत्थर के गर्व पर पानी की तरलता का |
"प्रत्येक दिन अलग स्वप्न में देखता हूँ तुम्हें |
तट पर गीली रेत में धंसे पैरों के साथ |
किनारे की काली मिटटी में सीप गड़े हैं |
तुम्हारे ज़ेवर हैं , छोर पर बिखरे हैं |
समेटकर बाँध लेता हूँ ,
धुंधले पानी को छाती से लगाकर ,
दीर्घ निः श्वास में विलीन हो जाता हूँ |
काले आकाश के तले सब रंगीन हैं , विस्तीर्ण है |
तुम विशाल हो , अदभुत हो ,
मैं यहाँ खोना चाहता हूँ , तुमको स्वयं में |
मेरी लालसा का यही चरम है , यहाँ किनारे पर |"
सुबह ले आती है , चारदीवारें और एक रोशनदान |
नमकीन हवा में एक भीनी स्मृति बह रही है ,
साठ दिनों की स्मृति |
"इतने दिनों बाद आज सूरज को देखा है |
सलाखों के बाहर वही गंध है , तुम्हारी |
सामने रस्सी है ,
बरामदे के काले पत्थरों में रेत है ,
कहीं कहीं |
उंचाई पर खड़ा हूँ ,
तुम्हें नहीं देखा सकता |
श्रुति है केवल , विस्मित हूँ |
नहीं मैं मरना नहीं चाहता ,
मुझे प्रेम है तुमसे , तुम्हारी उस रेतीली देह से |"
गर्दन पर जकड़न सी हुई |
"मैंने समुद्र को देखा है ,
तुमने मुझे नहीं देखा |"
July 11, 2011
March 23, 2011
योद्धा
गर्वित सीना ,
आवरण और कवच
सागर और रेत की गर्माहट में
सीमान्त की रेखा |
ये युद्ध है ,
तुम्हारा उत्तरदायित्व है, लड़ना
और जीतना |
यह तुम्हारी नियति है ,
यह तुम्हारा धर्म है |
आग्रह नहीं था किसीका ,
न ही विकल्प था |
बस परिपक्वता का उपहार था ,
प्रतिष्ठा थी संदूक में बंद ,
सीमा के पार |
अब निभाओ उसे ,
तलवार उठाओ ,
जंग लगी ढाल संभालो ,
कवच से ढकी देह को उद्दत करो
और जाओ वहां ,
जहाँ की भूमि में वासना है , लालसा है |
बहते रक्त में बलिदान ढूँढो ,
रणभेरी के शोर में विजय ढूँढो |
लाल तिलक की गरिमा को सार्थक करो ,
क्योंकि पराक्रम की परिभाषा तो किसी ने नहीं लिखी |
यहाँ कोई पार्थ नहीं , कोई अर्जुन नहीं है |
यहाँ न न्याय है न सत्य |
यहाँ बस युद्ध है , शौर्य है ,पौरुष है |
वीर बनो , बलिदान मांगो |
तुम योद्धा हो ,
जाओ लड़ो |
आवरण और कवच
सागर और रेत की गर्माहट में
सीमान्त की रेखा |
ये युद्ध है ,
तुम्हारा उत्तरदायित्व है, लड़ना
और जीतना |
यह तुम्हारी नियति है ,
यह तुम्हारा धर्म है |
आग्रह नहीं था किसीका ,
न ही विकल्प था |
बस परिपक्वता का उपहार था ,
प्रतिष्ठा थी संदूक में बंद ,
सीमा के पार |
अब निभाओ उसे ,
तलवार उठाओ ,
जंग लगी ढाल संभालो ,
कवच से ढकी देह को उद्दत करो
और जाओ वहां ,
जहाँ की भूमि में वासना है , लालसा है |
बहते रक्त में बलिदान ढूँढो ,
रणभेरी के शोर में विजय ढूँढो |
लाल तिलक की गरिमा को सार्थक करो ,
क्योंकि पराक्रम की परिभाषा तो किसी ने नहीं लिखी |
यहाँ कोई पार्थ नहीं , कोई अर्जुन नहीं है |
यहाँ न न्याय है न सत्य |
यहाँ बस युद्ध है , शौर्य है ,पौरुष है |
वीर बनो , बलिदान मांगो |
तुम योद्धा हो ,
जाओ लड़ो |
January 31, 2011
नर्मदा
चिकने सफ़ेद पत्थरों की नींव पर,
पारदर्शी चादर में लिपटे रेत कण |
सूर्योदय से सूर्यास्त की गोद है ,
बहते संगीत से मल्लाह के शोर तक ,
किनारे बैठे एकाकी की साथी है |
सुबह के पानी में उठते हुए धुंए में ,
मंदिर की धूप की सुगंध है |
फूलों के पत्तल से, राख की ढेर तक ,
पानी में खेलते बच्चों से ,
घाट की कच्ची सीढ़ियों पर पड़ी
नाव की जीर्णता तक |
एक युग की किताब है |
जिज्ञासा है , पिपासा है |
वह अंत है , वह अंतहीन है |
सुन्दर है , मेरी है |
वह नर्मदा है |
पारदर्शी चादर में लिपटे रेत कण |
सूर्योदय से सूर्यास्त की गोद है ,
बहते संगीत से मल्लाह के शोर तक ,
किनारे बैठे एकाकी की साथी है |
सुबह के पानी में उठते हुए धुंए में ,
मंदिर की धूप की सुगंध है |
फूलों के पत्तल से, राख की ढेर तक ,
पानी में खेलते बच्चों से ,
घाट की कच्ची सीढ़ियों पर पड़ी
नाव की जीर्णता तक |
एक युग की किताब है |
जिज्ञासा है , पिपासा है |
वह अंत है , वह अंतहीन है |
सुन्दर है , मेरी है |
वह नर्मदा है |
November 16, 2010
केवल इतना
दुबली देह पर फंसी सूती साडी में ,
चूल्हे पर रोटियां बनाती हूँ तो ,
कभी- कभी याद आता है ,
कि नर्म , सुन्दर हाथ होते तो ,
पास बैठाकर , उन्ही से खिलाती |
संध्या जब अपनी सीमा छूती है ,
तब देहरी पर दिया लेकर प्रतीक्षा करती हूँ तो ,
थोड़ा गुनगुना लेती हूँ |
मैं गा नहीं सकती |
शादी की पुरानी बनारसी निकालकर ,
थोड़े से गहनों में सजना चाहूँ ,
तो अजीब लगता है |
मैं सज संवर कर, रिझा नहीं सकती |
जब देश दुनिया की बातें करते हो तो
तुम्हारे पैर दबाते हुए ,
मुझे कोई मजाक क्यूँ नहीं सूझता |
मैं बातें बना नहीं सकती |
केवल सुन सकती हूँ , पूरी तन्मयता से ,
एक-एक शब्द को |
थके हुए सर को , जली हुई ,रूखी ही सही ,
पर अपनी उँगलियों से , दबा सकती हूँ |
नर्म सूती की गोद में लिटाकर ,
एकाध लोरी शायद याद आ जाए |
देहरी पर की गयी प्रतीक्षा,
मेरे दिन भर की नीरसता का एक मात्र आकर्षण है ,
स्वयं की पूजा है |
केवल इतना कर सकती हूँ |
चूल्हे पर रोटियां बनाती हूँ तो ,
कभी- कभी याद आता है ,
कि नर्म , सुन्दर हाथ होते तो ,
पास बैठाकर , उन्ही से खिलाती |
संध्या जब अपनी सीमा छूती है ,
तब देहरी पर दिया लेकर प्रतीक्षा करती हूँ तो ,
थोड़ा गुनगुना लेती हूँ |
मैं गा नहीं सकती |
शादी की पुरानी बनारसी निकालकर ,
थोड़े से गहनों में सजना चाहूँ ,
तो अजीब लगता है |
मैं सज संवर कर, रिझा नहीं सकती |
जब देश दुनिया की बातें करते हो तो
तुम्हारे पैर दबाते हुए ,
मुझे कोई मजाक क्यूँ नहीं सूझता |
मैं बातें बना नहीं सकती |
केवल सुन सकती हूँ , पूरी तन्मयता से ,
एक-एक शब्द को |
थके हुए सर को , जली हुई ,रूखी ही सही ,
पर अपनी उँगलियों से , दबा सकती हूँ |
नर्म सूती की गोद में लिटाकर ,
एकाध लोरी शायद याद आ जाए |
देहरी पर की गयी प्रतीक्षा,
मेरे दिन भर की नीरसता का एक मात्र आकर्षण है ,
स्वयं की पूजा है |
केवल इतना कर सकती हूँ |
October 09, 2010
यात्रा
मन के पाट पर स्मित रेखाएं ,
आधी अधूरी बातें ,
अप्रत्याशित वादों की
स्याह गहराई ,
मुरझा तो गई , पर
जीवित है,मंद मंद सी टीस में |
इस क्षितिज से उस क्षितिज तक ,
एक संकरी पगडण्डी पर ,
अपेक्षाओं के जाल हैं ,
आशा के तिनके हैं ,
तर्क और विवेक से लड़ते हुए |
उस पर छोटे बड़े क़दमों से चलना है |
रोज की दूरी ,
अकेले तय करने के निश्चय को चुनौती देती है |
रेत के पदचिन्ह हैं ,
भावना की हवा में नहीं टिकेंगे,
मेरे संघर्ष के परिणाम की तरह |
संवेदना में मिथ्या है |
मेरी यात्रा तुमसे दूर ,
बहुत लम्बी है , बहुत कठिन है |
आधी अधूरी बातें ,
अप्रत्याशित वादों की
स्याह गहराई ,
मुरझा तो गई , पर
जीवित है,मंद मंद सी टीस में |
इस क्षितिज से उस क्षितिज तक ,
एक संकरी पगडण्डी पर ,
अपेक्षाओं के जाल हैं ,
आशा के तिनके हैं ,
तर्क और विवेक से लड़ते हुए |
उस पर छोटे बड़े क़दमों से चलना है |
रोज की दूरी ,
अकेले तय करने के निश्चय को चुनौती देती है |
रेत के पदचिन्ह हैं ,
भावना की हवा में नहीं टिकेंगे,
मेरे संघर्ष के परिणाम की तरह |
संवेदना में मिथ्या है |
मेरी यात्रा तुमसे दूर ,
बहुत लम्बी है , बहुत कठिन है |
September 23, 2010
कहानी
एक कहानी ,
खाली पन्ने , चंद शब्द,
बिखरी स्याही और सूनी कलम |
पुरानी यादें झाँक रही हैं ,
अकेली खिड़की से ,
असंख्य विचारों की श्रंखला,
प्रतीक्षा में खड़ी है |
क्या लिखूं ,
विस्तृत दृष्टिकोण के असमंजस ,
गंभीर,चंचल ,बचपन ,सुन्दरता और भय |
सुखद स्मृतियाँ या दुखी सा दर्पण |
अनछुई भावनाओं की पेटी
खोलूं या नहीं |
लिखूं की एकांत में भी रस है ,
अकेली सड़क हूँ , साथ चलती हूँ |
की रात सुन्दर है ,समेटती है मुझे अपने विहान में |
की संगीत की लय में मन की जिज्ञासा है,
धीमी ,मद्धिम , मौन |
बारिश की बूँद को चेहरे की आस या ,
घडी के रिक्त स्थान को क्षणिक मिलन की |
उनके बारे में लिखूं ,
जो अपरिचित सुख के मित्र और गहन विचार के साथी हैं |
कुछ दिन की मुस्कान , रौशनी भरे स्वप्न देकर
धूमिल हो गए जो ,
या जीवन की परतों को
हल्क़े हल्क़े स्पर्श से सरल करते हैं , आज भी |
एक कहानी , अर्थ और परिभाषाएं|
विकल्पों की उलझन, खाली पन्ना ,
और चंद शब्द |
खाली पन्ने , चंद शब्द,
बिखरी स्याही और सूनी कलम |
पुरानी यादें झाँक रही हैं ,
अकेली खिड़की से ,
असंख्य विचारों की श्रंखला,
प्रतीक्षा में खड़ी है |
क्या लिखूं ,
विस्तृत दृष्टिकोण के असमंजस ,
गंभीर,चंचल ,बचपन ,सुन्दरता और भय |
सुखद स्मृतियाँ या दुखी सा दर्पण |
अनछुई भावनाओं की पेटी
खोलूं या नहीं |
लिखूं की एकांत में भी रस है ,
अकेली सड़क हूँ , साथ चलती हूँ |
की रात सुन्दर है ,समेटती है मुझे अपने विहान में |
की संगीत की लय में मन की जिज्ञासा है,
धीमी ,मद्धिम , मौन |
बारिश की बूँद को चेहरे की आस या ,
घडी के रिक्त स्थान को क्षणिक मिलन की |
उनके बारे में लिखूं ,
जो अपरिचित सुख के मित्र और गहन विचार के साथी हैं |
कुछ दिन की मुस्कान , रौशनी भरे स्वप्न देकर
धूमिल हो गए जो ,
या जीवन की परतों को
हल्क़े हल्क़े स्पर्श से सरल करते हैं , आज भी |
एक कहानी , अर्थ और परिभाषाएं|
विकल्पों की उलझन, खाली पन्ना ,
और चंद शब्द |
August 27, 2010
तेरह दिन
लोगों ने कहा , पिताजी नहीं रहे |
और फिर जैसे मौसम चला गया ,
सूखी , सर्द , कांपती हवा ,कुछ कहती रही पत्तों से |
आँगन की धूप को नज़र सी लग गयी |
दो दिन , चार दिन ,माँ बहुत रोई |
आँगन में बैठी औरतें और बरामदे में बैठे आदमी ,
जाने क्या फुसफुसाते रहे |
ज़मीन ,जायदाद ,कच्ची उम्र ,
गूंजे हुए शब्दों का घना सन्नाटा |
आठ दिन , नौ दिन |
सूनापन ,खाली होता घर ,धीरे धीरे कम होती सांत्वना |
माँ की सिसकी सूख गयी है |
" कैसी निष्ठुर है तू ? रोती क्यों नहीं ?"
" जाने कैसी लड़की है ! "
संसार अभी भी धुरी पर है|
ग्यारह दिन , बारह दिन , समय भी तो नहीं रुका |
अब कोई नहीं आएगा , सांझ को दरवाज़े पर मुझे आवाज़ देने ,
छोटी बातें सिखाने , प्यार से पुकारने , गोद में उठाने |
तेरह दिन,
मैं नहीं रोउंगी |
और फिर जैसे मौसम चला गया ,
सूखी , सर्द , कांपती हवा ,कुछ कहती रही पत्तों से |
आँगन की धूप को नज़र सी लग गयी |
दो दिन , चार दिन ,माँ बहुत रोई |
आँगन में बैठी औरतें और बरामदे में बैठे आदमी ,
जाने क्या फुसफुसाते रहे |
ज़मीन ,जायदाद ,कच्ची उम्र ,
गूंजे हुए शब्दों का घना सन्नाटा |
आठ दिन , नौ दिन |
सूनापन ,खाली होता घर ,धीरे धीरे कम होती सांत्वना |
माँ की सिसकी सूख गयी है |
" कैसी निष्ठुर है तू ? रोती क्यों नहीं ?"
" जाने कैसी लड़की है ! "
संसार अभी भी धुरी पर है|
ग्यारह दिन , बारह दिन , समय भी तो नहीं रुका |
अब कोई नहीं आएगा , सांझ को दरवाज़े पर मुझे आवाज़ देने ,
छोटी बातें सिखाने , प्यार से पुकारने , गोद में उठाने |
तेरह दिन,
मैं नहीं रोउंगी |
Subscribe to:
Posts (Atom)