August 27, 2010

तेरह दिन

लोगों ने कहा , पिताजी नहीं रहे |
और फिर जैसे मौसम चला गया ,
सूखी , सर्द , कांपती हवा ,कुछ कहती रही पत्तों से |
आँगन की धूप को नज़र सी लग गयी |

दो दिन , चार दिन ,माँ बहुत रोई |
आँगन में बैठी औरतें और बरामदे में बैठे आदमी ,
जाने क्या फुसफुसाते रहे |
ज़मीन ,जायदाद ,कच्ची उम्र ,
गूंजे हुए शब्दों का घना सन्नाटा |

आठ दिन , नौ दिन |
सूनापन ,खाली होता घर ,धीरे धीरे कम होती सांत्वना |
माँ  की सिसकी सूख गयी है |
" कैसी निष्ठुर है तू ? रोती क्यों नहीं ?"
" जाने कैसी लड़की है ! "
संसार अभी भी धुरी पर है|

 ग्यारह दिन , बारह दिन , समय भी तो नहीं रुका |
अब कोई नहीं आएगा , सांझ को दरवाज़े पर मुझे आवाज़ देने ,
छोटी  बातें सिखाने , प्यार से पुकारने , गोद में उठाने |
तेरह दिन,
मैं नहीं रोउंगी |

July 25, 2010

तुम

तुम ,
अभय , स्थिर , गहन |
समुद्र में द्वीप से ,
स्वयं में पूर्ण |

मैं ,
विहीन , निश्चल , जिज्ञासा से भरी |
मर्यादा की छाँव में पली |
उस पक्षी की तरह,
जिसका आकाश सीमित है
उस द्वीप तक ,
तुम तक |

जब तक साथ हूँ
निश्चित हूँ , उस ढाँचे की कला में ,
जो तुमने बनाया है
मेरे लिए ,
अपने धर्म से , या शायद प्रेम से |

"स्व" के कितने ही पर्याय जान लूँ ,
अलग नहीं हो सकती ,
तुम्हारे अस्तित्व से |

तुम ,
विराट , साहसी , असीम |

मैं ,
लज्जित , निरीह , तुच्छ |

July 18, 2010

कुर्सी के पीछे बैठा लड़का

कक्षा में बैठी छात्रा ,
और कुछ कहती से एक आकृति |
खिल-खिलाहट , चहकना ,हंसी |
सीखने का प्रयत्न करना ,रुकना ,
एक अजीब से उत्साह को देखना |

और कुर्सी के पीछे बैठा वह लड़का|
हँसता , अपने आप में निर्मग्न ,
उदासीन विषय से कुछ दूर ,
वह विचारों से बातें करता हुआ |
ढूँढने के प्रयत्न में ,उसे जो
अथाह समुद्र के बीच है ,
जो जीवन के सच का पर्याय है ,
जो चंचल है, स्वच्छ  है , प्रेम है |

सोचती छात्र की बाहर आ सकूँ ,
इस सोच से , इस अंधी बनावट से
और देख सकूँ उस रेखा के पार ,
जहाँ रौशनी है ,मद्धिम सी राह पर चलती |
और फिर लिखने लग जाती वह ,
कागज़ और कलम से बंधी हुई |

आकृति अभी भी बोल रही है |

April 08, 2010

गुलमोहर

कल जब आप न होंगे ,
सूनी गलियों में हम
खड़े रहेंगे आहिस्ता सी शाम को देखते,
और फिर वो गुलमोहर नज़र आएगा
चिलचिलाती धूप में एक उम्मीद |

निकल पड़ेंगे मुस्कान लिए
एक उसी छाँव के सहारे |
कुछ वर्षों की यादें ,और उस फूल की लाली,
लेकर सहेज लेंगे |

खड़ा होगा वह
सुन्दरता की पराकाष्ठा पर |
और सीखना होगा उस से
की बीती हुई संध्या की लकीर
खूबसूरत बन जाती है |
वह
गुलमोहर |